Hindi poem
कभी तू खुद को, खुद से अलग करके देख....
हो सखे तो, अंजानेसे से ही सही खुद को टकरा के देख....
गिरते हुए खुद को, सम्भलने का मोका देकर देख...
खाबो की मंजीशो मे जिने वाले खुद को,हकीकत के रास्तो से रुबरु करके देख...
हो सखे तो, अंजाने सफर का हमसफर हो कर देख....
किस्मत की जीत को, परिश्रम का आईना दिखाकर देख ...
हारी हुई बाजी को, एक अनुभव की सिडी बनाकर देख....
आखरी जीत पर,अहंकार को हराकर देख...,
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